साधक-- प्रणाम गुरुदेव।
गुरु-- मनोवाञ्छा फलसिद्धिरस्तु।
साधक-- कैसे सिद्ध होगी गुरुदेव? मेरी मनोकामना तो ईश्वर को पाना है। इसके अवसर दूर दूर तक दृष्टिगोचर नहीं
होते!
गुरु-- क्यों भाई, क्या
हुआ?
साधक-- मैंने बहुत साधना की। बहुत प्रयास किए।
वह सब कुछ किया जो मुझे बताया गया। किंतु अब तक भगवान की पैर का अंगूठा भी नहीं
दिखा।
गुरु-- अच्छा, तुमने
क्या-क्या किया?
साधक-- मैं ने स्तोत्र पढ़ें, जप किया, उपवास रखे, तीर्थ
यात्रायें की, नदी स्नान किए, परिक्रमा
किए, कई मंदिरों के दर्शन किए, और बहुत
दान पुण्य किए.. यही सब तो आपने बताया था।
गुरु-- हां सही है।
साधक-- क्या सही है? देखिए
तो, यह सब भगवत प्राप्ति के लिए ही तो करते हैं। तो भगवान
क्यों नहीं मिल रहे हैं?
गुरु-- कब से कर रहे हो यह सब?
साधक-- जी, जब से आपसे
मिला हूं, इन्हीं कार्यों में लगा हूं। अन्य सब कार्य छोड़कर
अधिक से अधिक इन्हीं को करता हूँ। पूरे दो साल हो गए।
गुरु-- अच्छा, दो साल हो
गए?
साधक-- जी बिल्कुल। और कितने साल मुझे प्रतीक्षा
करने पड़ेंगे? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि, कुछ जल्दी हो जाए? कुछ और करूँ?
गुरु-- दिन में कितनी देर कर लेते हो, जप और स्तोत्र पाठ?
साधक-- जी यही कोई दो, तीन
घंटे।
गुरु-- अच्छा, दो-तीन घंटे,
क्या बात है!
साधक-- जी। आपके बताने के बाद एक दिन भी मैं ने
क्रम नहीं तोड़ा। चाहे कितने भी काम आ जाए, कितनी भी अड़चनें
आ जाए- मैंने उतने निर्दिष्ट समय तक हमेशा वह सब साधनाएं की, जो आपने करने को कहा। सब नियम पालन किये। आज तक एक भी नहीं टूटा।
गुरु-- बहुत बढ़िया।
साधक-- आप ने तो कहा था, कि
भक्ति पूर्वक करने से जल्दी सिद्धि मिलती है।
गुरु-- हाँ, मिलती तो है।
अच्छा, तुम्हारे साथ यह बच्चा कौन है?
साधक-- यह मेरे भैया का बेटा है, छे साल का।
गुरु-- क्या करता है?
साधक-- पढता है। पाठशाला जाता है। अभी पहली
कक्षा में पहुंच गया।
गुरु-- यह कब से जा रहा है विद्यालय?
साधक-- जी, केजी से डाला
था, तो दो साल से जा रहा है।
गुरु-- अच्छा, तो अब तक
इसे नौकरी नहीं मिली?
साधक-- जी नौकरी??!!
गुरु-- हां, नौकरी!! पढ़ाई
तो नौकरी के लिए ही करते हैं ना?
साधक-- जी करते तो हैं। पर नौकरी तो आजकल के
हिसाब से कम से कम पीजी पास करने के बाद ही मिलेगी। और उसके लिए अभी १७ साल का समय
है।
गुरु-- अच्छा अभी नौकरी करने के लिए १७ साल इसको
पढ़ने पड़ेंगे??
साधक-- जी और क्या? दसवीं
तक तो विद्यालय में, फिर दो साल प्लस टू, उसके बाद तीन साल की डिग्री, या चार साल की
इंजीनियरिंग, या जो इसके नसीब में लिखा हो वह। उसके बाद फिर
पीजी!! तब जाकर कहीं नौकरी की सोच सकते हैं।
गुरु-- अच्छा, क्या उससे
पहले कुछ नहीं हो सकता??
साधक-- जी ऐसी तो कोई व्यवस्था नहीं है। उसके
बाद भी भाग्य से ही नौकरी मिलती है।
गुरु-- क्या यह ठीक से नहीं पढता? नियम पालन नहीं करता? जो टीचर बताती है, वह सब नहीं करता क्या?
साधक-- जी, क्यों नहीं
करता? यूनिफार्म पहनना पड़ता है, टाइ,
जूते, बेज, पुस्तक की
बैग सब स्वयं सँभालता है। समय पर ही जाता है, आता है,
गृहकार्य भी करता है। खूब मन लगाकर पढ़ता है।
गुरु-- अच्छा, कितने घंटे
पढ़ता है, यह बच्चा दिन में?
साधक-- सुबह 9:00 बजे
स्कूल जाता है, 3:00 बजे वापस आता है। फिर ट्यूशन जाता है।
वहां शाम तक पढ़ता है।
गुरु-- अच्छा इतने घंटे पढ़ने के बाद भी उसे कोई
जल्दी से नौकरी मिलने की रास्ता नहीं है?
साधक-- जी, नहीं है। अभी
तो यह बिल्कुल बहुत छोटा है नौकरी के लिए।
गुरु-- अरे, बच्चा तो बड़ा
होनहार दिखता है। क्या फिर भी जल्दी नौकरी नहीं मिलेगी इसको?
साधक-- जी, ऐसे बिल्कुल
व्यवस्था नहीं है। आप तो सब जानते हैं। फिर भी ऐसा क्यों पूछ रहे हैं?
गुरु-- जब एक दुनिया के सामान्य से नौकरी के लिए
१७ साल पढ़ने पड़ते हैं, विद्यालय-महाविद्यालय आदि जाकर दिन
में कई घंटे पढ़ाई में, परीक्षाओं के साथ- बिताना पड़ता है,
तो भगवत आराधना के सिर्फ दो ही सालों में तुम्हे फल कैसे मिलेगा?
स्वयं सोचो।
साधक-- जी, समझ गया।
क्षमा। फिर कभी निराश नहीं होऊंगा।
गुरु-- शुभं भूयात्॥
--उषाराणी सङ्का
26.05.2018
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