Wednesday, May 30, 2018

संवाद 2 - सन्यासी और लौकिक - एक संवाद

लौकिक-- आप क्या करते हैं?
संन्यासी-- जो इस वस्त्र के लायक कार्य है।
लौकिक-- मैंने तो कभी किसी योगी, संन्यासी, साधु को कुछ कामकाज करते नहीं देखा। इनसे समाज का कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
सन्यासी-- अच्छा। कोई बात नहीं।
लौकिक-- कभी संन्यासी अपने पैरों पर खड़ा नहीं होता। कुछ कमाते नहीं, अपना घर नहीं होता। सभी वस्तु के लिए समाज पर निर्भर होते हैं। बस, घुमक्कड़ होते हैं। ना ही माता-पिता के प्रति उनका दायित्व रहता है। और कई लोगों का अक्षर ज्ञान भी नहीं होता।
सन्यासी-- हां, परन्तु तपस्या करने के लिए यह सब आवश्यक है..
लौकिक-- कैसी तपस्या? खाना पीना छोड़ देना? शरीर को तपाना? पीड़ित करना? सुखाना? शारीरिक सुख से दूर रहना? यह सब तो सैडिजम् और शोषण है, जोकि साइकोलोजी के हिसाब से बहुत गलत है। कभी भी व्यक्ति को आत्मपीड़ा नहीं करनी चाहिए। यह आत्मघात के समान है।
संन्यासी-- हाँ, लेकिन यह तो अभ्यास का भाग है।
लौकिक-- कैसा अभ्यास? और किस लिए? घर छोड़ा, लोगों को छोड़ा। काम छोड़ा। विवाह न किया। एसा करने से उनकी मानसिकता बड़ी खराब होजाती है। और तो और वंश भी नहीं चलता आगे।
संन्यासी-- हाँ, लेकिन वे यह सब एक परमार्थ प्रयोजन के लिए करते हैं।
लौकिक-- परमार्थ? मैं ने तो कोई परमार्थ नहीं देखा। सच कहें, तो गलती इनकी नहीं है। गुरु लोग सब पट्टी पढाते हैं। स्वयं बिगड़े दूसरों को भी बिगाड़ते चलते हैं। और अपनी सेवाके नाम पर बहुत जुलुम करते हैं। वह तो मेरे कोच सर के कहने पर आपसे मिलने आया हूँ। वरना आता नहीं।
सन्यासी-- जैसे आप को ठीक लगे। अच्छा, यह बताइए कि आप क्या करते हैं?
लौकिक-- मैं अथिलीट हूं। दौड़ता हूँ, देश के लिए। अपना सारा जीवन इसी क्रीडा में लगाया है।
संन्यासी-- अच्छा। क्या क्या लगाया?
लौकिक-- यह पूछिए क्या नहीं लगाया! समय, परिश्रम, धन- सब लगाया। कई वर्षों का अभ्यास है।
सन्यासी-- बहुत अच्छे। कौन हैं आपकी प्रेरणा?
लौकिक-- जी, वे मेरे कोच हैं। बहुत अच्छे कोच मिले मुझे। बहुत सही मार्गदर्शन दिया। मुझे कोच ने जो जो कहा, मैंने वही किया।
सन्यासी-- तो कोच ने क्या कहा आपसे?
लौकिक-- कोच? यही कहते हैं, कि बेटा, अधिक से अधिक समय अभ्यास में लगाना। कभी नशा मत करना। पैसे की लालच न करना। लड़कियों के चक्कर में मत पड़ना। पैसा और प्यार भी नशा है जिसके चक्कर में पड़ने से खेलना असंभव हो जाता है। शरीर व मन बलहीन होजाते हैं।
संन्यासी-- तो आप ने विवाह नहीं की?
लौकिक-- नहीं।
लौकिक-- कोच सर का स्कूल मैं ही चलाता हूँ। इसलिए विवाह नहीं किया। आगे भी नहीं करना है।
संन्यासी-- तो माता पिता की देखभाल कौन करता है?
लौकिक-- जी, अभी पिताजी क्रियाशील हैं। माता समर्थ है। मेरे एक बड़े भैया हैं, वो सँभाल लेते हैं। 
संन्यासी-- कितना समय घर पर रहते हैं?
लौकिक-- जी, मैं बहुत कम समय घर पर रहता हूं। मैं बचपन से ही खेल में ही अधिक समय बिताता हूं।
संन्यासी-- यह सब किया, तो बदले में क्या मिला?
लौकिक-- बहुत कुछ। पैसा, नाम, गौरव, सरकार की ओर से घर- सब से बढ़कर आत्म संतृप्ति।
संन्यासी-- अच्छा, आपको भूख लग रही होगी। यह दूध पीलीजिए। कोई देकर गया। संन्यासी हूँ, अधिक कुछ नहीं है मेरे पास।
लौकिक-- इतना सारा मलाई वाला दूध? नहीं, इससे कोल्सेट्राल बढता है। मैं ठीक से दौड़ नहीं पाऊंगा।
संन्यासी-- आप शरीर पर इतना शोषण क्यों कर रहे हैं?
लौकिक-- कैसा शोषण? मुझे बहुत संयम रखना पड़ता है। अथिलीट यूँ ही नहीं बना।
संन्यासी-- वाह, अब तक के सम्भाषण से पता चलता है कि आप ने भी सब किया जो मैं ने किया। फिर भी आप करो तो संयम, हम करें तो शोषण?
लौकिक-- जी?
संन्यासी-- जी हाँ। आप ही नहीं, हर कोई - जो कोई भी कुछ फल सिद्ध करना चाहता है, यही करता है। सारे क्रीडाकार, सैनिक, पुलिस, डिटेक्टिव, विद्यार्थी, संगीत-नृत्य-कलाकार, लेखक, चित्रकार, सिनेमा वाले, परिशोधक- सभी। अपने अपने क्षेत्र में आगे बढने के लिए बहुत कुछ त्याग करते ही हैं। समय, धन, मनोरञ्जन, मित्र, बन्धु, घर, मातापिता- सब को छोड़ के चलते हैं। घुमक्कड़ भी बनते हैं। अभ्यास करने में ही मन लगाते हैं। इस संसार में कुछ भी परिश्रम व तपस्या के विना मिलता नहीं है।
लौकिक-- मानता हूँ। पर उनका फल दिखता है। लेखक कथाएँ लिखता है, विद्यार्थी परीक्षा उत्तीर्ण होकर वृत्ति पाकर कमाता, खिलाता है। इसी प्रकार अन्य। आप लोगों का तो सब करके भी कुछ नहीं होता।
संन्यासी-- यह अन्दर की यात्रा है। कुछ होना न होना अन्दर से पता चलता है। दिखने वाला फल नहीं, अनुभूत होने वाला फल है। आप ने जिसे आत्मसन्तृप्ति कहा, यह वैसी ही है आत्म की ओर यात्रा, स्वाध्याय का पथ। यह असीम शान्ति, व आनन्द का मार्ग है। कामक्रोधादि शत्रुओं से लडते हैं, और भगवत्प्राप्ति के लिए प्रयत्न में रहते हैं। संसार को त्यागना प्रथम पद होता है, इस सोपान क्रम में।
लौकिक-- जी। क्षमा कीजिए। समझ गया।
संन्यासी-- क्या समझ गए?
लौकिक-- जितनी देर से यहाँ बैठा हूँ, अन्दर एक सुकून और शान्ति का अनुभव होरहा है। मुझे यहाँ आने से पहले सिरदर्द की गहरी पीड़ा थी। अब नहीं है। और ऐसे विवाद करने पर सामने वाले को कभी इतनी शान्ति से समाधान देते नहीं सुना। यहाँ सारा वातावरण एक अनोखी सी निःशब्दता को धारण किए हुए है। तब से इसी बात को अन्तः सोच रहा था। इसीसे आपकी तपस्या की गहराई समझ आती है। इसीलिए भेजा होगा कोच सर ने मुझे आपके पास। आगे कभी किसी साधु की निन्दा नहीं करूंगा।
संन्यासी-- अस्तु। शुभं भूयात्॥

--उषाराणी सङ्का

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