Wednesday, May 30, 2018

संवाद 3 - मन्दिर और वस्त्रधारण-एक संवाद

पिता--कहां जा रही हो?
बेटी--मंदिर।
पिता--ऐसे कपड़े पहन कर? इतनी मेकअप?
बेटी--हां क्या बुराई है इन कपड़ो में? मेकअप तो हमेशा करती हूँ।
पिता--अरे, मंदिर जाते समय विनीत वेष होकर जाना चाहिए। सादे कपड़ों में मंदिर जाकर अच्छा लगता है।
बेटी--क्या भगवान हमारे कपड़े देखते हैं या मन? क्या इन कपड़ों मे मेरी भक्तिभावना कम होजाएगी? मन साफ हो तो सब सही होगा। आप ही तो कहते हैं कि भगवान के सामने मन सबसे मुख्य वस्तु है।
पिता--हां, मैंने कहा था; मन के अनुसार शरीर का होना भी तो आवश्यक है। मंदिर में और लोग भी आते हैं। उन लोगों को शरीर ही दिखता है- तुम्हारा मन नहीं।
बेटी--आते होंगे..आने दो। नहीं दिखे, उनकी समस्या है। मुझे क्या? उन्हे अपने काम से काम रखना सीखना होगा।
पिता--अच्छा, काम की बात आ ही गई, तो मन्दिर में क्या करने जा रही हो तुम?
बेटी--दर्शन करने। मन्नत माँगने। ध्यान करने। शान्त होने- और क्यों?
पिता--तो उनमें इन कपड़ों का क्या काम? इतनी मेकअप करके ही शान्ति मिलती है क्या?
बेटी--पर मैं हमेशा इसी तरह रहती हूं। फैशनपरस्त।
पिता--नहीं, झूठ। तुम अपने दोस्त के घर जाते समय ऐसी नहीं जाती। पास के पार्क में, सुबह जागिंग करने, सब्जी लाने जाते समय, और शाम को माँ के साथ टहलने जाते समय, टेनिस खेलते समय- ऐसे नहीं जाती। अस्पताल में मरीज़ को देखते जाते समय क्या तुम फैशन करके जाती हो?
बेटी--मुझे ऐसे जाने की इच्छा हुई, सो जा रही हूँ।
पिता--क्यों हुई? मेकअप का क्या अर्थ होता है? क्यों करते हैं मेकअप, वह भी इतना समय व्यर्थ करके?
बेटी--अच्छा लगता है, आत्मविश्वास बढता है। वरना कोई हमारे ओर नहीं देखता है।
पिता--तो क्या तुम्हें मंदिर में सब तुम्हें देखें इस भावना से जा रही हो?
बेटी--आप बहस बहुत कर रहे हैं आज। कपड़े पहनना, मेकअफ करना हमारी अभिरुचि की पहचान है।
पिता--अभिरुचि की अभिव्यक्ति का स्थान मन्दिर नहीं होता है। भगवान के सामने इन सब ढोंगो की आवश्यकता है ही नहीं।
बेटी--अच्छा, तो कैसे जाना चाहिए? चन्दन का तिलक लगाकर, चोटी बाँधकर, बड़े बड़े बभूत की रेखाएं रखकर? इनसे क्या मिलता है? क्या यह सब केवल दिखावा नहीं है? ड्रामा नहीं है?
पिता--अच्छा, एक बात बताओ। तुम जब अपने मेडिकल कॉलेज में पढने जाती थी, तो एप्रन, स्टेथ क्यों पहनती थी? क्या वह ढोंग था? उसके बिना तुम पढ नहीं पाती?
बेटी--नहीं वह तो मेरा यूनिफार्म हुआ करता था, वह महाविद्यालय के अनुशासन का अन्तर्भाग था।
पिता--तुम्हारे भैया आर्मी में है तो वह हमेशा घर आने तक भी आर्मी के कपड़ों में ही रहता है। तो क्या वह ड्रामा करता है? क्या इन कपड़ों के बिना उसकी देशभक्ति नहीं है?
बेटी--नहीं, वह ढोंग ड्रामा नहीं है। वह उनका कर्तव्य निर्वहण की निशानी है। उन्हे उन कपड़ो में देखकर जब बच्चे सलाम मारते हैं- तो मुझे बड़ा गर्व होता है।
पिता--क्या पुलिस वाले पुलिस की विशेष कपड़े ढोंग के लिए पहनते हैं? उसके बिना लोगों की रक्षा नहीं कर सकते?
बेटी--नहीं, ऐसा नहीं है। वे कपड़े हमें बताने के लिए कि, वह पुलिस है। उन्हें देखकर हमारी हिम्मत बढ़ती है। यह व्यवस्था का अन्तर्भाग है।
पिता--बिल्कुल सही। फिर भगवान की सेवा के लिए, साधना के लिए, उसके अनुसार समुचित कपड़े पहनने में क्या बुराई है? लोगों को लगना चाहिए कि मन्दिर जारही हो, फैशन शो में नहीं।
बेटी--भगवान कोई व्यवस्था है क्या?
पिता--नहीं। पर मंदिर अवश्य व्यवस्था है। और उस व्यवस्था का सम्मान रखना हम सब का कर्तव्य है।
बेटी--यह बात मेरी कुछ समझ में नहीं आ रही है। मैं ने किसी का अन्याय नहीं किया है- ऐसे कपड़े पहनकर।
पिता--अच्छा, तुम पिछले सप्ताह किसी कॉकटेल पार्टी में गई थी। उस दिन तुम्हारा बड़ा अपमान हुआ था.. कि तुम्हे नए फैशन के हिसाब से कपड़े नहीं पहने। तो तुम घर आकर रोई थी। क्या उस दिन तुम ने किसी का अन्याय किया था? क्या वह तुम्हारे कपड़ों का प्रभाव नहीं था?
बेटी--सही है। था।
पिता--पार्टी में जाते हैं, तो पार्टी के लायक कपड़े पहनते हैं। शॉपिंग में जाते हैं, तो उसके लायक कपड़े पहनते हैं। ऑफिस में फॉर्मल वेयर पहनते हैं। ऑटोरिक्षा चलाने वाले से लेकर योगी सन्यासी तक हर व्यवस्था में एक वर्दी या विशिष्ट वस्त्र धारण को अपनाया जाता है। भतीजा स्कूल जाते समय बेज, टाई, शू सब पहनकर क्यो जाता है? तुम्हारी दीदी कंपनी में काम करते जाते समय अपना ID कार्ड वगैरह सब लेकर जाती है, क्यों??
बेटी--वह उनका प्रोफाइल के अंतर्गत है। उसके बिना वह लोग दीदी को अंदर नहीं आने देते। पर मंदिर में मुझे इन कपड़ो में कौन रोकेगा?
पिता-- कितना अच्छा होता यदि रोकदेते..। पर ऐसा नहीं है। कोई रोकता टोकता नहीं है। हमें स्वयं कुछ चीजें समझ लेनी चाहिए। मंदिर शांत होकर, प्रसन्नचित्त से अपने मन की ताप व अंदर की अशांति को निकाल फेंकने के लिए लोग जाना चाहते हैं। वहां पर वे प्रार्थना करते हैं, मौन रहकर भगवान की ध्यान इत्यादि, यथाशक्ति स्तोत्र आदि करते हैं। हमारे बाहरी अहंकार एवं अन्य चित्त विकारों को बाहर ही छोड़कर जाना उचित होगा। हमें मंदिर जाते समय स्वयं के रूप एवं वस्त्र धारण अटकना नहीं चाहिए।
बेटी--अच्छा, बात तो सही है।
पिता--पहले सब लोग इस बात को स्वयं ही समझ लेते थे। स्त्रियां साड़ी में सिर ढककर, और पुरुष धोती कुर्ते में जाते थे। उन्हें मंदिर जाते समय अपने रूप किस प्रकार का रखना है, यह समझ अपने आप हुआ करता था। आजकल के युवा पीढ़ी में यह पूरी तरह खत्म हो गई है। वह हर जगह अपने आप वस्त्रधारण का पूरा पूरा खयाल स्वयं रखा करते हैं, जैसे कालेज, फंक्शन, होटल इत्यादि जाते समय। उसी प्रकार यदि वे मंदिर जाते समय भी करते, तो अन्य को आपत्ति नहीं होती।
बेटी--पर आजतक मुझसे किसी ने कहा ही नहीं कुछ।
पिता--कोई तुमसे कहेगा नहीं बेटी। यह आधुनिक पार्टी नहीं है- कि कोई मुँह पर कुछ भी कह दें। पर अंदर ही अंदर तुम्हें कोसेंगे कि उनका ध्यान बांटने वाले कपड़े पहन कर आ रही हो। कितनी लज्जाहीन लड़की है। इसके घर वालों ने इसे कुछ नहीं समझाया। मैं ने अन्यत्र जाते समय तुम्हें कभी नहीं रोका। पर कम से कम मंदिर का सम्मान रखना तुम्हारा कर्तव्य है।
बेटी--ठीक है पापा। मैं आपकी बात से सहमत हूं। मैं सादे कपड़ों में ही मंदिर जाऊंगी।

--उषाराणी सङ्का
(18.05.2018)

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