गुरु-- कहाँ थे इतने दिन?
शिष्य-- परीक्षा की तैयारी कर रहा था। सिविल्स्।
गुरु-- तो परीक्षा हो गई?
शिष्य-- जी हां ।
गुरु-- कैसे लिखी परीक्षा?
शिष्य-- जी बहुत अच्छा लिखा। तैयारी के लिए सब
कुछ छोड़ छाड़ के प्रयास किया। उम्मीद से भी अच्छा लिखा। बहुत संतुष्टि है।
गुरु-- तो बताओ। कैसे आना हुआ।
शिष्य-- बस, साधना को लेकर
कुछ एक प्रश्न करने थे। बहुत दिनों से जप कर रहा हूं। कोई फल नहीं मिला।
गुरु-- कितना जप करते हो?
शिष्य-- जी प्रतिदिन एक हजार कर लेता हूं।
गुरु-- जब प्रतिदिन बीसहज़ार हो जाए तब बता
देना। उससे पहले तो फल की बात भी मत करना ।
शिष्य-- यह कैसे संभव है गुरुदेव? मैं ठहरा विद्यार्थी। कल को वृत्ति के अन्वेषण करनी है। और घर के दायित्व
निभाने हैं। एक दिन में बीसहज़ार जप के लिए मुझे कम से कम 10 घंटे लगेंगे। कहां से
लाऊंगा इतने घंटे?
गुरु-- तो फिर फल की बात ही मत करना। जब साधना
युक्त परिमाण में नहीं कर रहे हो, तो उसके फल की चिंता छोड़
देनी चाहिए। जितना कर सकते हो उतना फल तो तुमको अवश्य मिलरहा है न। लेकिन तुम
जितना फल चाह रहे हो, उस के लिए अधिक समय देना ही पड़ेगा।
अन्यथा वह नहीं मिलेगा।
शिष्य-- यह तो बहुत अन्याय है गुरुदेव। हम जैसे
लोगों के लिए क्या फिर किसी साधना का आशा करना भी व्यर्थ है? कोई घर गृहस्थी वाले जप-साधना कैसे करें? समय ही
कहां मिलता है? घर में इतनी अशांति रहती है। मित्र बंधु
परिवार.. सबको संभालते हुए कहां इन चीजों का स्वप्न भी हम देखें?
गुरु-- अभी अभी तुम्हारी परीक्षा हुई थी न। उसके
लिए तुमने कितने घंटे की पढ़ाई की?
शिष्य-- जी उसके लिए तो, नहाना,
सोना, खाना- इतने आवश्यक काम छोड़कर बाकी सारा
समय पढ़ाई में ही लगा दी थी, तब जाकर परीक्षा अच्छी हुई।
गुरु-- तो क्या तब घर की जिम्मेदारियां नहीं थी?
दायित्व नहीं थे? घर क्या शांति का मन्दिर बन
गया था? मित्र बंधु परिवार के प्रति कर्तव्य नहीं थे?
शिष्य-- जी बिलकुल थे। वहीं पर थे। कुछ कम नहीं
हुए। इसीलिए तो मुझे परीक्षा की तैयारी बहुत भारी पड़ी। बहुत थक गया हूँ।
गुरु-- फिर भी तुमने किया है। है ना?
शिष्य-- जी हां।
गुरु-- क्या यह सब तुम्हे परीक्षा का स्वप्न
देखते समय पता था?
शिष्य—जी, अच्छी तरह पता था। वह असंभव को संभव करना ही था। मैंने उल्टी बहाव में
तैरकर गंगा पार की है।
गुरु-- तो जब वही परिस्थितियाँ, वही दायित्व, वही कर्तव्य- तुम्हारी परीक्षा की
तैयारी में अड़चन नहीं बन सके तो फिर जप साधना में क्यों बन रहे हैं?
शिष्य-- जी प्रश्न तो बिल्कुल सही है। किंतु
परीक्षा की तैयारी केवल चालीस दिन की ही थी। इतने दिन तक घर में सबको मना लिया।
एवं सहयोग की प्रार्थना की। तब जाकर पढ़ाई कर पाया।
गुरु-- तो फिर जप-साधना वगैरह के लिए भी तो
चालीस दिन की ही बात की गई है। मंडल काल के नियम व्रत दीक्षा की ही हमारा धर्म बात
करता है। उससे अधिक कोई कुछ नहीं बोलता। किसी भी जप की सिद्धि के लिए या कुछ
विशिष्ट फल पाने के लिए इतना समय व्यतीत करना ही पड़ता है। इससे कम वाले भी हैं,
जैसे एकाह, सप्ताह, इक्कीसदिन..
इत्यादि।
शिष्य-- जी, मानता हूँ।
गुरु-- इतने कर्तव्यों के बीच में जिस प्रकार
तुमने केवल IAS की परीक्षा की दृष्टि से ही तुम्हारा सारा 40
दिनों को पूरी तरह भर दिया था, उतने ही समय, उसी विधान से इसमें समय लगाओ। और कहो तो, तुम्हारी
परीक्षा के लिए तुम्हें सारा दिन लगाना पड़ा। लेकिन जप के लिए केवल कुछ घंटे ही
लगेंगे तुमको। और उसके लिए तुम्हें कुछ विशेष व्यवस्था की भी आवश्यकता नहीं। न ही
पुस्तक, न ही अध्यापक, न ही तैयारी।
शिष्य-- जी, सत्य है।
गुरुदेव के आशीर्वचन के साथ निर्देश मिले, तो सब होजाता है।
गुरु-- लौकिक फलों में व्यक्ति बहुत समय परिश्रम
एवं प्रयत्न लगाता है। किंतु वही बात हम साधना की दिशा में करने को कहते हैं,
तो लोगों को कई सारी अड़चनें याद आ जाती हैं। और साधना को कठिन
मानने लगते हैं। बस, यही रहस्य है और कुछ नहीं। इच्छित फल के
लिए प्रयत्न तो करना ही पड़ेगा। बिना युक्त प्रयत्न के फल के लिए सोचे भी तो कैसे॥
⛳💞🙏
--उषाराणी सङ्का
(श्रीशारदामाता (रामकृष्णपरमहंस जी की पत्नी) के
पुस्तक-निर्देश से प्रेरित, एवं एक वैयक्तिक घटना पर आधारित)
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